#गोण्डवाना
#कवधुरवा
#नाग_टोटमधारी
#दुल्हापेन
#दुल्हीपेन
कोयतोरक पेन दूल्हा देव व दुल्ही देव गोण्ड जनजाति की देव हैं पेन हैं ।
यह #गुड़ी इसका सबूत है । यह गुड़ी #गोण्डवाना बाहुल्य #छत्तीसगढ़ के कवर्धा (#कवधुरवा) जिले में स्थित है। इसका निर्माण फणिनागवंशी (#टोटमधारी) २४ राजा रामचंद देवराज द्वारा सन् १३४९ ई. सन् में अपनी विवाह उपरांत किया था। इसे मंदिर कहकर दुष्प्रचारित किया गया जबकि यह मड़वा या #मांडो का आकार है। मड़वा या मांडों का निर्माण गोण्ड जनजाति आज भी करती है और विशेष अवसर पर मांडों में ही पेनों को सेवा अर्जि दी जाती है। इस मांडों में फणी नागवंश की पुरुषों की वंशावली लिखा गया है। चूंकि दुल्हापेन की पूजा का संदर्भ ही पुरुषों की वंश विस्तार व दुल्हीपेन की पूजा महिलाओं की वंश विस्तार हेतु की जाती है।
इस मांडों को शिव का मंदिर कहना ही गलत है। यदि इस तरह हुआ है तो यह कालान्तर में यहाँ सांस्कृतिक आक्रमण की ओर इशारा करती है।
दुल्हापेन की जानकारी लेकर बहुत जल्द पोस्ट करूंगा ।
#कवधुरवा
#नाग_टोटमधारी
#दुल्हापेन
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कोयतोरक पेन दूल्हा देव व दुल्ही देव गोण्ड जनजाति की देव हैं पेन हैं ।
यह #गुड़ी इसका सबूत है । यह गुड़ी #गोण्डवाना बाहुल्य #छत्तीसगढ़ के कवर्धा (#कवधुरवा) जिले में स्थित है। इसका निर्माण फणिनागवंशी (#टोटमधारी) २४ राजा रामचंद देवराज द्वारा सन् १३४९ ई. सन् में अपनी विवाह उपरांत किया था। इसे मंदिर कहकर दुष्प्रचारित किया गया जबकि यह मड़वा या #मांडो का आकार है। मड़वा या मांडों का निर्माण गोण्ड जनजाति आज भी करती है और विशेष अवसर पर मांडों में ही पेनों को सेवा अर्जि दी जाती है। इस मांडों में फणी नागवंश की पुरुषों की वंशावली लिखा गया है। चूंकि दुल्हापेन की पूजा का संदर्भ ही पुरुषों की वंश विस्तार व दुल्हीपेन की पूजा महिलाओं की वंश विस्तार हेतु की जाती है।
इस मांडों को शिव का मंदिर कहना ही गलत है। यदि इस तरह हुआ है तो यह कालान्तर में यहाँ सांस्कृतिक आक्रमण की ओर इशारा करती है।
दुल्हापेन की जानकारी लेकर बहुत जल्द पोस्ट करूंगा ।

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